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ग़ज़ल
बाप का है फ़ख़्र वो बेटा कि रखता हो कमाल
देख आईने को फ़रज़ंद-ए-रशीद-ए-संग है
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
बिल-यक़ीं लख़्त-ए-जिगर अपना था फ़रज़ंद-ए-ख़लील
सुर्ख़-रू दीदा-ए-तर है है कि क़ुर्बां कर दिया
फ़ैज़ झंझानवी
ग़ज़ल
दो-जहाँ की ने'मतें फ़रज़ंद-ए-आदम के लिए
अब फ़क़त क्यूँकर करे फ़िरदौस का दा'वा कोई
मोहम्मद ग़ुलाम नूरानी
ग़ज़ल
ये ख़्वाब-ओ-ख़ुर फ़रज़ंद-ओ-ज़न और माल-ओ-ज़र ज़िंदाँ हुआ
तो छूट कर इस क़ैद सूँ हासिल करे दीदार कब
अलीमुल्लाह
ग़ज़ल
वो तो हवा-ए-वक़्त के झोंके थे ऐ 'ख़लीक़'
क्यों आज सोचते हो कि यारों को क्या हुआ