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ग़ज़ल
दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक जाऊँ उन को दिखला दूँ
उँगलियाँ फ़िगार अपनी ख़ामा ख़ूँ-चकाँ अपना
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ये तुलू-ए-रोज़-ए-मलाल है सो गिला भी किस से करेंगे हम
कोई दिलरुबा कोई दिल-शिकन कोई दिल-फ़िगार कहाँ रहा
अदा जाफ़री
ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मरहम की जुस्तुजू में फिरा हूँ जो दूर दूर
तन से सिवा फ़िगार हैं इस ख़स्ता-तन के पाँव
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
दिल हो ख़याल-ए-यार में आँख हो इंतिज़ार में
मेरे दिल-ए-फ़िगार में हसरत-ए-मा-सिवा नहीं
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
कब पाँव फ़िगार नहीं होते कब सर में धूल नहीं होती
तिरी राह पे चलने वालों से लेकिन कभी भूल नहीं होती