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ग़ज़ल
मिरा दिल तो शम्स-ए-अबद के गिर्द तवाफ़ करती ज़मीन है
ये कोई गलोब तो है नहीं जो तुम्हारे हाथ में घूमता
शाहिद माकुली
ग़ज़ल
'ग़ालिब'-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाए हाए क्यूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
है गै़ब-ए-ग़ैब जिस को समझते हैं हम शुहूद
हैं ख़्वाब में हुनूज़ जो जागे हैं ख़्वाब में
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवाँ सूरज की किरन है उस पे लिपट
जाली की कुर्ती है वो बला गोटे की धनक फिर वैसी ही
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
उस ने पेड़ से कूद के जाने कितने ग़ोते खाए
बंदर को जब लगा नदी में गिरा हुआ है चाँद