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ग़ज़ल
बड़ी इबरत की मंज़िल है ज़मीं गोर-ए-ग़रीबाँ की
यहाँ अपनी हक़ीक़त पर नज़र पड़ती है इंसाँ की
मोहम्मद अब्बास सफ़ीर
ग़ज़ल
तुम आ के क्या मुतबस्सिम हुए लहद पर मिरी
चराग़-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ जला दिया तुम ने
जमीला ख़ातून तस्नीम
ग़ज़ल
आलम-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ का ये ग़मनाक सुकूत
इक नमूना है मिरे दिल की शकेबाई का
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
'आशिक़ की तुर्बतों को मिटा कर ये कह दिया
लो अब निशान-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ नहीं रहा
जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल
'अजब दुनिया-ए-हैरत आलम-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ है
कि वीराने का वीराना है और बस्ती की बस्ती है
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
ऐ सबा औरों की तुर्बत पे गुल-अफ़्शानी चंद
जानिब-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ भी कभी आया कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
कर्बला में या नजफ़ में चल के मर जाएँ 'मुनीर'
हिन्द में हम पहलू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ हों तो क्या
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
क़दम सँभाल के रख पाएमाल हो न कोई
ज़मीन-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ है फ़र्श-ए-ख़्वाब नहीं
महाराजा सर किशन परसाद शाद
ग़ज़ल
खींच लाएगी कभी तो कशिश-ए-इश्क़ उन्हें
गुज़र उन का भी सू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ होगा
अब्दुल मजीद ख़्वाजा शैदा
ग़ज़ल
सर-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ आ के फ़ित्ने क्यों उठाते हैं
क़यामत है अदम के सोने वालों को जगाते हैं
सफ़दर मिर्ज़ापुरी
ग़ज़ल
देखूँ जो कभी आओ सू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ
जी उठते हैं मुर्दे दम-ए-रफ़्तार कहाँ तक
सययद हुमायु मिर्ज़ा हक़ीर
ग़ज़ल
नफ़स के साथ ही क़ैद-ए-त'अल्लुक़ टूट जाती है
पलट कर फिर सू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ कौन देखेगा
मख़मूर देहलवी
ग़ज़ल
दिल इस पर आरज़ू आसूदा हो जाता है दुनिया से
कभी गर मंज़र-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ देख लेते हैं
अफ़क़र मोहानी
ग़ज़ल
ले गया था तरफ़-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ दिल-ए-ज़ार
क्या कहें तुम से जो कुछ वाँ का तमाशा देखा