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ग़ज़ल
आह को बाद-ए-सबा दर्द को ख़ुशबू लिखना
है बजा ज़ख़्म-ए-बदन को गुल-ए-ख़ुद-रू लिखना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
बू-ए-गुल पत्तों में छुपती फिर रही थी देर से
ना-गहाँ शाख़ों में इक दस्त-ए-सबा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
जिन पे बारिश-ए-गुल है उन का हाल क्या होगा
ज़ख़्म खाने वाले भी बाग़ बाग़ हैं यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
दिल में मत ढूँड कि ऐ तालिब-ए-ईसार-ओ-वफ़ा
अब ये अल्फ़ाज़ किताबों में नज़र आते हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
कितने अज़ीज़ हैं ये मसीहा को क्या ख़बर
वो ज़ख़्म-ए-दिल जो लज़्ज़त-ए-आज़ार तक गए
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
मुझे तो चश्म-ए-गुरेज़ाँ भी इल्तिफ़ात लगी
तिरे सितम पे भी ईसार का गुमाँ गुज़रा