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ग़ज़ल
सरवत हुसैन
ग़ज़ल
ख़िज़ाँ की ज़द में गुल-ए-तर है क्या किया जाए
यही चमन का मुक़द्दर है क्या किया जाए
फ़ाख़िर जलालपुरी
ग़ज़ल
मुझ पे दहलीज़ से फेंका है गुल-ए-तर किस ने
मेरे अल्लाह जगाया है मुक़द्दर किस ने
अअज़ीक़ुरहमान सारिम
ग़ज़ल
ज़ाहिरन ये बुत तो हैं नाज़ुक गुल-ए-तर की तरह
दिल मगर होता है कम-बख़्तों का पत्थर की तरह
शौक़ बहराइची
ग़ज़ल
शमीम-ए-ज़ुल्फ़ ओ गुल-ए-तर नहीं तो कुछ भी नहीं
दिमाग़-ए-इश्क़ मोअत्तर नहीं तो कुछ भी नहीं