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ग़ज़ल
सच बोलने के जुर्म में जिस को सज़ा मिली
देखो वो ख़ुश-नसीब गुनह-गार मैं ही हूँ
प्रोफ़ेसर महमूद आलम
ग़ज़ल
गुनाह-गार-ओ-सियहकार हूँ मगर फिर भी
ख़ुदा की शान कि मुझ से ख़फ़ा नहीं होता