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ग़ज़ल
ज़माना क़िस्सा-ए-दार-ओ-रसन को भूल न जाए
किसी के हल्क़ा-ए-गेसू में वो कशिश ही नहीं
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
हो मुक़ाबिल नाला-ए-दर्द-ए-दिल-ए-उश्शाक़ के
बाग़बाँ बुलबुल को ऐसा भी तराना याद है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
ग़ज़ल
लश्कर-ए-क़ल्ब-ए-सफ़-ए-उश्शाक़ में है ग़लग़ला
यक्का-ताज़-ए-आह कूँ किस ने किया है ना-रसीद
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बुल-हवस जामा-ए-उर्यानी-ए-उश्शाक़ को देख
तू गरेबान से क्यूँ अपना गला बाँधे है
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
क्या बिना-ए-ख़ाना-ए-उश्शाक़ बे-बुनियाद है
ढल गया सर से मिरे साया तिरी दीवार का
अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ
ग़ज़ल
पस-ए-मुर्दन पए-पामाल गोरिस्ताँ में फिरते हैं
निशान-ए-तुर्बत-ए-उश्शाक़ मिल जाए कहीं हम को
अज़ीज़ुर रहमान अज़ीज़ पानी पती
ग़ज़ल
हर बरहमन भी दीद का मुश्ताक़ है सो है
उस बुत को पास-ए-ख़ातिर-ए-उश्शाक़ है सो है
मीर शम्सुद्दीन फ़ैज़
ग़ज़ल
तुझ बर में सजन जल्वा-नुमा सुर्ख़ क़बा देख
ख़ून-ए-दिल-ए-उश्शाक़ ने फिर जोश किया है