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ग़ज़ल
लिख रहा हूँ हर्फ़-ए-हक़ हर्फ़-ए-वफ़ा किस के लिए
माँगता हूँ ज़िंदा रहने की दु'आ किस के लिए
सुलतान रशक
ग़ज़ल
हर्फ़-ए-हक़ फिर हर्फ़-ए-हक़ है और उभरता जाएगा
लाख मंसूबे बना डालो मिटाने के लिए
ख़ुर्शीद फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
मंतिक़-ए-असर सलीक़ा-ए-हर्फ़-ए-हक़ क्या जाने
वहशी के क़ब्ज़े में तबर दूँ ये नहीं होगा
महशर बदायुनी
ग़ज़ल
किसे हर्फ़-ए-हक़ सुनाऊँ कि यहाँ तो उस को सुनना
न ख़वास चाहते हैं न अवाम चाहते हैं
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
ग़ज़ल
कि हर्फ़-ए-हक़ तो अदा हो गया है होंटों से
ज़माना चाहे तो नेज़े पे अब उछाले मुझे
शहज़ाद अंजुम बुरहानी
ग़ज़ल
ज़ख़्मी सरहद ज़ख़्मी क़ौमें ज़ख़्मी इंसाँ ज़ख़्मी मुल्क
हर्फ़-ए-हक़ की सलीब उठाए कोई मसीह तो आए अब