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ग़ज़ल
हिसार-ए-हर्फ़-ओ--हुनर तोड़ कर निकल जाऊँ
कहाँ पहुँच के ख़याल अपनी वुसअ'तों का हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
हर्फ़-ओ-अल्फ़ाज़-ओ-म’आनी के हिजाबों में न थी
बात चेहरों पर जो लिक्खी थी किताबों में न थी
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
मुद्दतों के बाद फिर कुंज-ए-हिरा रौशन हुआ
किस के लब पर देखना हर्फ़-ए-दुआ रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
कब खुला उक़्दा 'रज़ा' जब कर चुके इज़हार-ए-शौक़
मुद्दआ' जाएज़ था हर्फ़-ए-मुद्दआ' मा'यूब था
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
वो हर्फ़-ए-आरज़ू जिस पर मुकम्मल ज़ब्त है अब तक
कहीं ऐसा न हो शर्मिंदा-ए-इज़हार हो जाए
कँवल एम ए
ग़ज़ल
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
दु'आ क़ुबूल हो या रब कि 'उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ग़म कि था हरीफ़-ए-जाँ अब हरीफ़-ए-जानाँ है
अब वो ज़ुल्फ़ बरहम है अब वो चश्म गिर्यां है