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ग़ज़ल
दौलत और शोहरत लोगों ने क़िस्मत से आगे पाई
और मुसीबत भी हम को तो बस हस्ब-ए-औक़ात मिली
अक़ील नोमानी
ग़ज़ल
ख़ुल्द में भी हस्ब-ए-आदत वा'ज़ फ़रमाएँगे क्या
शैख़ हूरों से हजामत अपनी बनवाएँगे क्या
हाशिम अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
जमाल-ए-यार पर मिटता है कोई हुस्न-ए-फ़ितरत पर
इसी ज़ौक़-ए-अमल को निस्बत-ए-औक़ात कहते हैं