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ग़ज़ल
आग हवन की तेज़ है इतनी सारे मंत्र भुला देगी
इस वेदी पर सीधा वाला हाथ हमेशा जलता है
मधूरिमा सिंह
ग़ज़ल
तुम्हारी यादें मिरे दिल में ऐसे रहती हैं
कि जैसे घी को किसी ने हवन में रक्खा है
सिराज मंज़र काकोरवी
ग़ज़ल
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
हुस्न और उस पे हुस्न-ए-ज़न रह गई बुल-हवस की शर्म
अपने पे ए'तिमाद है ग़ैर को आज़माए क्यूँ