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ग़ज़ल
ख़ून में ऊँचे चनारों के न हिद्दत आ सकी
यूँ ब-ज़ाहिर सब्ज़ पत्ते मुश्तइल होते गए
ज़हीर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
जब मिरे बच्चे मिरे वारिस हैं उन के जिस्म में
सोचता हूँ हिद्दत-ए-ख़ूँ की कमी अच्छी नहीं
सिब्त अली सबा
ग़ज़ल
बर्क़ गिरती है जिधर आँख उठा कर देखें
हिद्दत-ए-हुस्न से आसाब पिघल जाते हैं