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ग़ज़ल
तेरे कूचे के मज़े कब को समझता वाइज़
उस की तस्कीं के लिए ज़िक्र-ए-इरम अच्छे हैं
अल-हाज अल-हाफीज़
ग़ज़ल
क्या सुनाऊँ हाल-ए-दिल ऐ महव-ए-ख़्वाब-ए-इज़्ज़-ओ-नाज़
हो चुकी है ज़िंदगी वक़्फ़-ए-फ़ुग़ाँ तेरे बग़ैर
मज़हरुल क़य्यूम मज़हर
ग़ज़ल
मैं मस्त-ए-बादा-ए-हुब्ब-ए-अली हूँ ऐ 'अंजुम'
कभी बहक न सके जो वो बादा-ख़्वार हूँ मैं
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
ग़ज़ल
न हुब्ब-ए-जाह-ओ-हशम है न माल-ओ-ज़र की तलाश
दर-ए-फ़क़ीर पे किस ने ये ताज रक्खा है
शोएब अहमद ख़ान शोएब
ग़ज़ल
कहाँ का जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन कहाँ का ख़ुलूस
बस इक़्तिदार का चक्कर है क्या किया जाए
फ़ाख़िर जलालपुरी
ग़ज़ल
क़लम को मुस्तइद-ए-हुब्ब-ए-जाह लिख लीजे
मिरे गुनाहों में और इक गुनाह लिख लीजे