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ग़ज़ल
इधर तुम प्यास की हुर्मत का क़िस्सा छेड़ बैठे हो
उधर मौसम ये कहता है कि दरिया देखते रहिए
इक़बाल अशहर
ग़ज़ल
राम-ओ-गौतम की ज़मीं हुर्मत-ए-इंसाँ की अमीं
बाँझ हो जाएगी क्या ख़ून की बरसात के बा'द
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
बस्ती के घरों को क्या देखे बुनियाद की हुरमत क्या जाने
सैलाब का शिकवा कौन करे सैलाब तो अंधा पानी है
सलीम अहमद
ग़ज़ल
दुख़्तर-ए-रज़ को नहीं छेड़ते हैं मतवाले
हज़र उस फ़ाहिशा से करते हैं हुरमत वाले