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ग़ज़ल
ख़ुद-फ़रोशी को जो निकला वो अज़ीज़-ए-आलम
नर्ख़-ए-हुस्न-ए-मह-ए-कनआँ' सर-ए-बाज़ार घटा
कामरान जान मुश्तरी
ग़ज़ल
खोल कर आँखें ज़रा ये हुस्न-ए-महर-ओ-माह देख
दीद के क़ाबिल है ज़र्रा चर्ख़ पर पहुँचा हुआ
हीरा लाल फ़लक देहलवी
ग़ज़ल
चराग़-ए-मह सीं रौशन-तर है हुस्न-ए-बे-मिसाल उस का
कि चौथे चर्ख़ पर ख़ुर्शीद है अक्स-ए-जमाल उस का
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
चलो अच्छा ही हुआ मुफ़्त लुटा दी ये जिंस
हम को मिलता सिला-ए-हुस्न-ए-नज़र ही कितना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ख़ल्लाक़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ बड़ा दिल-नवाज़ है
तख़्लीक़-ए-शम्अ' होते ही परवाना बन गया