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ग़ज़ल
हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर तो ज़रबें सहनी पड़ती हैं
ग़रज़ इस्लाह होती है फ़क़त आज़ार क्या मतलब
मास्टर निसार अहमद
ग़ज़ल
उन्हें ही मर्तबा मिलता है जा के जन्नत में
हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर जो जान वारे गए
अज़ीम हैदर सय्यद
ग़ज़ल
गुल-गूना-ए-तरक़्क़ी-तहज़ीब-ओ-'इल्म से
शुक्र-ए-ख़ुदा कि सुर्ख़ हैं रुख़्सार आज-कल
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
जला दूँगा हुसूल-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद की ख़ातिर
जलानी पड़ गईं गर सारी अपनी कश्तियाँ मुझ को
अदील ज़ैदी
ग़ज़ल
हुसूल-ए-हासिल-ए-उल्फ़त में यूँ ख़राब न हो
फ़ुज़ूल दिल कहीं वाबस्ता-ए-अज़ाब न हो
ज़िया इलाहाबादी
ग़ज़ल
सुलूक-ए-इश्क़ में बे-फ़ैज़ हैं वो लब जिन से
हुसूल-ए-लज़्ज़त-ए-शीरीनी-ए-लुआब न हो
मुहिउद्दीन गुल्फ़ाम
ग़ज़ल
हुसूल-ए-अम्न-ओ-मुहब्बत की चाशनी के लिए
मिज़ाज-ए-तल्ख़ी-ए-दौराँ 'सुख़न' गवारा कर