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ग़ज़ल
अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे
इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए
मुनव्वर राना
ग़ज़ल
नज़र उन से ये संडे को बाग़ीचे में मिली ऐसी
कि अब हफ़्ते के हर दिन को मुझे इतवार करना है
आनंद वर्मा
ग़ज़ल
दर्जनों क़िस्से-कहानी ख़ुद ही चल कर आ गए
उस से जब भी मैं मिला इतवार छोटा पड़ गया