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ग़ज़ल
हमेशा चाहता है दिल कि मिल कर कीजे मय-नोशी
मयस्सर जाम-ए-मय-ए-जम-जम हमें भी हो तुम्हें भी हो
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
मुझे तो जाम-ओ-मय-ओ-गुल का इंतिज़ार नहीं
मैं ख़ुद बहार हूँ मेरे लिए बहार नहीं
अब्दुल मजीद दर्द भोपाली
ग़ज़ल
दिल को चश्म-ए-यार ने जब जाम-ए-मय अपना दिया
उन से ख़ुश हो कर लिया और कह के बिस्मिल्लाह पिया
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
आता है याद दौर-ए-मय-ओ-जाम-ए-मै-कदा
गर्दिश में देखता हूँ जो शम्स-ओ-क़मर को मैं
सय्यद मसूद हसन मसूद
ग़ज़ल
आता है याद दौर-ए-मय-ओ-जाम-ए-मै-कदा
गर्दिश में देखता हूँ जो शम्स-ओ-क़मर को मैं
सय्यद मसूद हसन मसूद
ग़ज़ल
साग़र-ए-सिफ़ालीं को जाम-ए-जम बनाया है
फैल कर मिरे दिल ने ''मैं'' को ''हम'' बनाया है
परवेज़ शाहिदी
ग़ज़ल
साक़ी ने जो ज़ाहिद को ज़रा आँख दिखाई
बे-ख़ुद हुए इक जाम-ए-मय-ए-होश-रुबा में