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ग़ज़ल
बहके जो हम मस्त आ गए सौ बार मस्जिद से उठा
वा'इज़ को मारे ख़ौफ़ के कल लग गया जुल्लाब सा
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
आब-ए-ज़ुलाल-ए-वस्ल से अंदोह-ए-दर्द-ओ-हिज्र
नापैद घुल के होता है क्या मिस्ल-ए-ज़ाज आज
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
मुझे है आरज़ू दिल में तिरी चाह-ए-ज़नख़दाँ की
नहीं दरकार हौज़-ए-कौसर ओ आब-ए-ज़ुलाल उस का
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
गह गह मिटाता हूँ ग़म-ए-दौराँ की तल्ख़ियाँ
याक़ूत-रंग होंटों के आब-ए-ज़ुलाल से
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
ग़ज़ल
उस को कहूँ मैं शहद या कहता रहूँ ज़ुलाल उसे
ऐसी मिठास 'ऐनी' है उन के दहन के आब में
सय्यद ख़ादिमे रसूल ऐनी
ग़ज़ल
शाम है और सुर्ख़ पेड़ों के दहकते साए भी
नींद में बहता हुआ धारा है जू-ए-आब का