आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "kaTe"
ग़ज़ल के संबंधित परिणाम "kaTe"
ग़ज़ल
ग़म-ए-इश्क़ में मज़ा था जो उसे समझ के खाते
ये वो ज़हर है कि आख़िर मय-ए-ख़ुश-गवार होता
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
शर्म-ए-रुस्वाई से जा छुपना नक़ाब-ए-ख़ाक में
ख़त्म है उल्फ़त की तुझ पर पर्दा-दारी हाए हाए
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
न हर्फ़-ए-हक़ न वो मंसूर की ज़बाँ न वो दार
न कर्बला न वो कटते सरों के नज़राने
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँ लोग
सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँ नहीं जाते