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ग़ज़ल
मिरा शुऊ'र भी शायद वो तिफ़्ल-ए-कम-सिन है
बिछड़ गया है जो गुमराहियों के मेले में
मुज़फ़्फ़र वारसी
ग़ज़ल
दुख़्तर-ए-रज़ की हूँ सोहबत का मुबाशिर क्यूँकर
अभी कम-सिन है बहुत मर्द से शरमाती है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
कभी दर्द-आश्ना तेरा भी क़ल्ब-ए-शादमाँ होगा
कभी नाम-ए-ख़ुदा तू भी तो ऐ कम-सिन जवाँ होगा
वासिफ़ देहलवी
ग़ज़ल
सितारा-ए-फ़लक-ए-हुस्न कहिए कम-सिन है
अभी वो चाँद का टुकड़ा मह-ए-तमाम नहीं