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ग़ज़ल
निधि गुप्ता कशिश
ग़ज़ल
चाहतों की आस में ढूँढा ज़माना ऐ 'कशिश'
तेरी ख़ातिर दूसरे लोगों को ठुकराना पड़ा
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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चाहतों की आस में ढूँढा ज़माना ऐ 'कशिश'
तेरी ख़ातिर दूसरे लोगों को ठुकराना पड़ा