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ग़ज़ल
बाग़बाँ की अब तवज्जोह है गुलिस्ताँ की तरफ़
पौदे बढ़ के ख़ुद लगाए हैं कई कटहल के पास
शौक़ बहराइची
ग़ज़ल
पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ
कोई आ के शम' जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता