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ग़ज़ल
पल दो पल का साथ है अब रौशनी का चल पड़ें
शाम है इक कतबा-ए-क़ब्र-ए-जवाँ खोले हुए
मुसव्विर सब्ज़वारी
ग़ज़ल
हाँ तुम्हीं पर जान देता हूँ तुम्हीं पर हूँ निसार
हाँ तुम्हीं पर है तबी'अत टूट कर आई हुई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क़ब्र में सोएँगे आराम से अब ब'अद-ए-फ़ना
आएगा ख़्वाब-ए-अदम दीदा-ए-बेदार के पास
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
कुछ दिनों बैठो सर-ए-क़ब्र-ए-'अज़ीज़'-ए-बे-नवा
ख़ानक़ाहों में बहुत दुश्वार है कामिल बनो
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
पस-ए-दीवार तड़पोगे कहाँ तक शौक़ कहता है
कमंद-ए-आह से चढ़ जाओ बाम-ए-क़स्र-ए-जानाँ पर
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
फ़ातिहा पढ़ने को आए क़ब्र-ए-'आतिश' पर न यार
दो ही दिन में पास-ए-उल्फ़त इस क़दर जाता रहा
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
इत्र-ए-फ़िरदौस-ए-जवाँ में ये बसाए हुए होंट
ख़ून-ए-गुल-रंग-ए-बहाराँ में नहाए हुए होंट
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
मिटाना था उसे भी जज़्बा-ए-शौक़-ए-फ़ना तुझ को
निशान-ए-क़ब्र-ए-मजनूँ दाग़ है सहरा के दामन में
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
पीरी में भला ढूँढिए क्या बख़्त-ए-जवाँ को
अब क़त्-ए-मोहब्बत ही हुई जिस्म से जाँ को
जोशिश अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
तलाश-ए-क़ब्र में यूँ घर से हम निकल के चले
कफ़न बग़ल में लिया मुँह पे ख़ाक मल के चले