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ग़ज़ल
ये फ़र्ज़ानों की दुनिया एक दीवानों की दुनिया है
जो पुख़्ता-कार-ए-उल्फ़त हैं उन्हें कहते हैं सौदाई
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
'ख़ार' है जल्वा-ए-अस्नाम से दिल ख़ुल्द-ए-बरीं
या परी-ज़ादों का मजमा' है परी-ख़ाने में
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
क़दम ले कर कलेजे से लगाते हैं कभी उस को
कभी होते हैं हम चश्म ओ लब ओ रुख़्सार के सदक़े
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
किसी पर बर्क़ गिरती है कोई चढ़ता है सूली पर
ब-क़दर-ए-ज़ौक़-ए-मुजरिम 'ख़ार' ताज़ीरें बदलती हैं
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक तो जानें एक तुझी को ख़बर न मिले
ऐ गुल-ए-ख़ूबी हम तो 'अबस बदनाम हुए गुलज़ार के बीच
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
सब पर गुल-ए-रा'ना की तो होती है नवाज़िश
क्या मेरे मुक़द्दर के लिए ख़ार बहुत हैं
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
ग़ज़ल
क्यूँ जानते हैं सनअत-ओ-हिरफ़त को बाग़-ए-ख़ुल्द
ग़ैरों की हम निगाह में हैं ख़ार आज-कल