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ग़ज़ल
किसी के ख़ंदा-ए-बे-जा का अब नहीं शिकवा
फ़ुग़ाँ भी दिल से निकलती नहीं फ़ुग़ाँ की तरह
मुनीर भोपाली
ग़ज़ल
वो भूले जाते हैं तर्ज़-ए-जफ़ा-ए-बे-जा को
हम अपना ज़ोर-ए-वफ़ा आज़माए जाते हैं
अब्दुल मन्नान बेदिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
ख़ंदा-ए-बे-ज़रर कहाँ ग़ुंचा-ओ-गुल से दर्स ले
फ़ितरत-ए-ज़िंदगी पे जा इशरत-ए-ज़िंदगी न देख
शहाब सर्मदी
ग़ज़ल
तिरी चश्म-ए-तरब को देखना पड़ता है पुर-नम भी
मोहब्बत ख़ंदा-ए-बे-बाक भी है गिर्या-ए-ग़म भी
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
नासेह जो ये नसीहत-ए-बे-जा न मैं सुनी
मा'ज़ूर रख तू मुझ को मिरा दिल बजा न था