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ग़ज़ल
वतन से आया है ये ख़त 'रक़ीब' मेरे नाम
हर एक लफ़्ज़ में गंग-ओ-जमन की ख़ुशबू है
सतीश शुक्ला ऱक़ीब
ग़ज़ल
मैं मुज़्तरिब हूँ वस्ल में ख़ौफ़-ए-रक़ीब से
डाला है तुम को वहम ने किस पेच-ओ-ताब में
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ख़ौफ़-ए-रक़ीब का तो ये 'आलम और उस पे इश्क़
सब चाहते हैं चाह का उन पर गुमाँ न हो
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
दिल में शर्मिंदा हैं एहसास-ए-ख़ता रखते हैं
हम गुनहगार हैं पर ख़ौफ़-ए-ख़ुदा रखते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
कितना बे-ख़ौफ़ था वो ग़ार की तारीकी में
आज हाथों में लिए शम्स-ओ-क़मर चीख़ता है
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
मोहतसिब ख़ौफ़-ए-शिकस्त-ए-साग़र-ए-रंगीं न पूछ
जब कोई ग़ुंचा चटकता है लरज़ जाता हूँ मैं
फ़ैज़ झंझानवी
ग़ज़ल
मैदान-ए-कार-ज़ार में 'अख़्तर' कभी भी मैं
ख़ौफ़-ए-सिनान-ए-ज़िल्ल-ए-इलाही न लाऊँगा