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ग़ज़ल
यही काँटे तो कुछ ख़ुद्दार हैं सेहन-ए-गुलिस्ताँ में
कि शबनम के लिए दामन तो फैलाया नहीं करते
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
अब मोहल्ले भर के दरवाज़ों पे दस्तक है नसीब
इक ज़माना था कि जब मैं भी बहुत ख़ुद्दार था
राहत इंदौरी
ग़ज़ल
मोहब्बत करने वाले भी अजब ख़ुद्दार होते हैं
जिगर पर ज़ख़्म लेंगे ज़ख़्म पर मरहम नहीं लेंगे
कलीम आजिज़
ग़ज़ल
तरस खाते हैं जब अपने सिसक उठती है ख़ुद्दारी
हर इक ख़ुद्दार इंसाँ को इनायत तोड़ देती है
जावेद नसीमी
ग़ज़ल
अच्छे लगते हो कि ख़ुद-सर नहीं ख़ुद्दार हो तुम
हाँ सिमट के बुत-ए-पिंदार में मत आ जाना
ऐतबार साजिद
ग़ज़ल
अगरचे हम तुम्हारी ही तरह ख़ुद्दार हैं फिर भी
तुम्हारे नाम पर कुछ रोज़ आहें भर ही लेते हैं