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ग़ज़ल
कितने मसरूफ़ हैं मसरूर नहीं फिर भी ये लोग
है ये क्या सिलसिला-ए-कार-ए-ज़ियाँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
मियान-ए-कार-ए-फ़न लफ़्ज़ों की क़िस्मत जाग उठती है
ग़ज़ल तख़्लीक़ करता हूँ मोहब्बत जाग उठती है
पीरज़ादा क़ासिम
ग़ज़ल
कार-ए-अफ़्ज़ाइश-ए-अनवार-ए-सहर किस ने किया
सिर्फ़ आफ़ाक़ मिरा रख़्त-ए-सफ़र किस ने किया
मुईन ताबिश
ग़ज़ल
बहार आई कर ऐ बाग़बाँ गुलाब क़लम
कि लिक्खे वस्फ़-ए-रुख़-ए-यार की किताब क़लम
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
ग़ज़ल
हम से मिल के फ़ितरत के पेच-ओ-ख़म को समझोगे
हम जहान-ए-फ़ितरत का इक सुराग़ हैं यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ख़ाक-ए-'शिबली' से ख़मीर अपना भी उट्ठा है 'फ़ज़ा'
नाम उर्दू का हुआ है इसी घर से ऊँचा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
सुलगना अंदर अंदर मिस्रा-ए-तर सोचते रहना
बदन पर डाल कर ज़ख़्मों की चादर सोचते रहना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
मैं ही तन्हा हूँ यहाँ उस की सलाबत का गवाह
कौन उठा कर ये मिरा संग-ए-हुनर ले जाएगा