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ग़ज़ल
क्या ख़ुश-मर्ज़ी थी लोगों पर लोगाँ जीते मरते थे
दिल वालों की बस्ती में अब क़ब्ज़ा है मन-तंगों का
परवेज़ रहमानी
ग़ज़ल
न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ
जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
आमिर अमीर
ग़ज़ल
ऐसे आहु-ए-रम-ख़ुर्दा की वहशत खोनी मुश्किल थी
सेहर किया ए'जाज़ किया जिन लोगों ने तुझ को राम किया