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ग़ज़ल
जब सब के लब सिल जाएँगे हाथों से क़लम छिन जाएँगे
बातिल से लोहा लेने का एलान करेंगी ज़ंजीरें
हफ़ीज़ मेरठी
ग़ज़ल
हर दम तड़प के लोटता फिरता हूँ ख़ाक पर
गोया बना हूँ ताइर-ए-बिस्मिल तिरे बग़ैर
नादिर शाहजहाँ पुरी
ग़ज़ल
कैसे तेशा-ओ-तेग़ बनाते कैसे ज़र्ब लगाते लोग
हथकड़ियाँ थीं सब के हाथों में जब लोहा गर्म हुआ
ज़ुहूर नज़र
ग़ज़ल
गधे को बाप कहती है ये दुनिया वक़्त पड़ने पर
अमल तू भी करे इस पर तो लफ़ड़ा हो नहीं सकता