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ग़ज़ल
तुझ पे मंडराता रहा साँस को छूने के लिए
तेरी ख़ुशबू से यूँ भँवरे को महकना होगा
प्रशान्त मिश्रा मन
ग़ज़ल
मदरसा या दैर था या काबा या बुत-ख़ाना था
हम सभी मेहमान थे वाँ तू ही साहब-ख़ाना था
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बेवफ़ाई में भी
मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
जब ये आलम हो कि मंडलाती हो हर सम्त को बर्क़
क्यूँ कोई नौहागर-ए-ख़िर्मन-ए-बर्बाद रहे