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ग़ज़ल
क्यूँ ये मेहर-अंगेज़ तबस्सुम मद्द-ए-नज़र जब कुछ भी नहीं
हाए कोई अंजान अगर इस धोके में आ जाए तो
अंदलीब शादानी
ग़ज़ल
काबा-ए-मद्द-ए-नज़र क़िबला-नुमा है ता-हाल
कू-ए-जानाँ की तरफ़ दिल निगराँ है कि जो था
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
तसव्वुर उस रुख़-ए-साफ़ी का रख मद्द-ए-नज़र नादाँ
लगाए मुँह जो आईने को आईना उसी का है
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
दाख़िल न दुश्मनों में न अहबाब में शुमार
मद्द-ए-फ़ुज़ूल हूँ मैं तुम्हारे हिसाब में
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
नज़र आता नहीं मानिंद-ए-अबरू एक माह-ए-नौ
महीनों रहती हैं वो हसरतें मद्द-ए-मुक़ाबिल में
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
उधर मद्द-ए-नज़र उन को छुपाना राज़ उल्फ़त का
इधर कम्बख़्त मेरी चश्म-ए-तर कुछ और कहती है
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
ऐ जज़्ब-ए-शौक़ रहम कि मद्द-ए-नज़र है यार
जा सकती वाँ तलक निगह-ए-ना-तवाँ नहीं