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ग़ज़ल
जो भी हैं सुब्ह-ए-वतन ही के परस्तारों में हैं
किन से हम ऐ शाम-ए-ग़ुर्बत तेरा अफ़्साना कहें
कँवल एम ए
ग़ज़ल
हर शख़्स मो'तरिफ़ कि मुहिब्ब-ए-वतन हूँ मैं
फिर 'अदलिया ने क्यूँ सर-ए-मक़्तल क्या मुझे
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
ग़ज़ल
बड़े-बड़ों पे भी 'माजिद' ब-नाम-ए-अर्ज़-ए-वतन
जो ए'तिमाद था अल-क़िस्सा मुख़्तसर न रहा
माज़िद सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
बे-मेहरी-ए-अर्बाब-ए-वतन कम तो नहीं है
हाँ देखना इस दिल की चुभन कम तो नहीं है
सय्यद शफ़क़ शाह चिश्ती
ग़ज़ल
कहाँ का जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन कहाँ का ख़ुलूस
बस इक़्तिदार का चक्कर है क्या किया जाए
फ़ाख़िर जलालपुरी
ग़ज़ल
फ़ज़ा-ए-सुब्ह-ए-गुलिस्ताँ से शाम-ए-ज़िंदाँ तक
ख़ुलूस-ए-हम-नफ़सान-ए-वतन की बात चली
मुर्तज़ा अली शाद
ग़ज़ल
मआल-ए-जुर्म-ए-तक़्सीम-ए-वतन क्या कम था रोने को
कि अब फ़िक्र-ओ-मलाल-ए-आशियाँ तक बात जा पहुँची
अनवर साबरी
ग़ज़ल
अज़्मत-ए-अर्ज़-ए-वतन क्या है ये हम से पूछो
इस के ज़र्रों को भी हम काहकशाँ जानते हैं