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ग़ज़ल
हवा के मद्द-ए-मुक़ाबिल चराग़ रख देना
मिज़ाज-ए-इश्क़ रहा है ये हर ज़माने में
अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी
ग़ज़ल
ज़ोहद अगर जंग-आज़मा हो खींचिए शमशीर-ए-शौक़
हुस्न अगर मद्द-ए-मुक़ाबिल हो सिपर रख दीजिए
सिराजुद्दीन ज़फ़र
ग़ज़ल
नज़र आता नहीं मानिंद-ए-अबरू एक माह-ए-नौ
महीनों रहती हैं वो हसरतें मद्द-ए-मुक़ाबिल में
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
तिरे चेहरे के ख़त्त-ओ-ख़ाल कोई क्या समझ पाए
तिरे मद्द-ए-मुक़ाबिल जब न कोई आइना ठहरे
जहूर बिस्वानी
ग़ज़ल
महाज़-ए-ज़ीस्त पे तन्हा ही लड़ रहा हूँ मैं
ख़ुद अपने मद्द-ए-मुक़ाबिल खड़ा हुआ हूँ मैं