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ग़ज़ल
कोई है महव-ए-ऐश-ओ-तलबगार-ए-ज़िंदगी
कोई है शिकवा-संज-ओ-गिराँ-बार-ए-ज़िंदगी
बशीरून्निसा बेगम बशीर
ग़ज़ल
ऐश मेरठी
ग़ज़ल
शबिस्तान-ए-मुसर्रत में जो महव-ए-ऐश-ओ-इशरत हैं
उन्हें इस का पता क्या रहरव-ए-मंज़िल पे क्या गुज़री
शाग़िल क़ादरी
ग़ज़ल
सच तो ये बात है ऐ 'ऐश' कि पाते हैं यहाँ
तेरे अशआ'र में तर्ज़-ए-सुख़न-ए-'मीर' की बू
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
फिरना उस कूचे में या पलकों से झाड़ू देनी
रात दिन हम को है ऐ 'ऐश' इसी काम से शौक़
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
ज़ुल्फ़-ए-बुताँ की याद में ऐ 'ऐश' क्या कहूँ
दिल ने मिरे उठाए हैं क्या पेच-ओ-ताब-ए-शब