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ग़ज़ल
वो मेक-अप के सहारे बन गई फिल्मों की हीरोइन
न हो नाज़-ओ-अदा तो नाज़िया में कुछ नहीं रक्खा
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
ऐ रिंदो हाथ पे हाथ धरे क्या साक़ी का मुँह तकते हो
महफ़िल में मचे कोहराम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है
ग़ज़ल
नए लश्कर नए नेज़े नई शर्तें हैं बैअ'त की
ये किस कूफ़े में हूँ मक्के मदीने वाला मैं तन्हा
इशरत क़ादरी
ग़ज़ल
क़िबले सूँ मूँह फिराया तिरे मुख की जानिब
किया ज़ाहिद ने मके सूँ सू-ए-बुत-ख़ाना सफ़र
फ़ाएज़ देहलवी
ग़ज़ल
जैसी मौजूद थी दिल में कोई ख़्वाहिश सो वो है
कोई मुशरिक न कोई मक्के से मुनकिर निकला