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ग़ज़ल
कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे
कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
रूठता हूँ जो कभी मैं तो ये कहता है वो शोख़
क्या ग़रज़ हम को पड़ी है जो मनाएँ तुझ को
लाला माधव राम जौहर
ग़ज़ल
हार में रहते हैं छुप के जीत जाने के सबक़
हौसला ज़िंदा है मातम क्यों मनाएँ हार पर
राघवेंद्र द्विवेदी
ग़ज़ल
अहबाब सुर्ख़-रू रहें दुश्मन हों ज़र्द-रू
जब तक मनाएँ मर्दुम-ए-हिन्दोस्ताँ बसंत