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ग़ज़ल
मस्त-ए-शराब-ए-इश्क़ वो बे-ख़ुद है जिस को हश्र
ऐ 'दर्द' चाहे लाए ब-ख़ुद पर न ला सके
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
न लाज़िम नीस्ती उस को न हस्ती ही ज़रूरी है
बयाँ क्या कीजिए ऐ 'दर्द' मुमकिन की ननाही को
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
दिल का हर दर्द था सर्माया-ए-हस्ती लेकिन
'फ़ैज़' ने अपनी ही उल्फ़त का गला घोंट दिया
दर्द फ़ैज़ ख़ान
ग़ज़ल
हमें तो बाग़ तुझ बिन ख़ाना-ए-मातम नज़र आया
इधर गुल फाड़ते थे जैब रोती थी उधर शबनम
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
'दर्द' हर-चंद मैं ज़ाहिर में तो हूँ मोर-ए-ज़ईफ़
ज़ोर निस्बत है वले मुझ को 'सुलैमान' के साथ
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
रात इंतिज़ार-ए-दोस्त क़यामत से कम न था
हसरत से देखता रहा दीवार-ओ-दर को मैं
अब्दुल मजीद दर्द भोपाली
ग़ज़ल
जो ख़ुद से हो बे-परवा और इश्क़ से बेगाना
ऐ 'दर्द' वो क्या समझे अफ़्साना मोहब्बत का