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ग़ज़ल
जो यहाँ मग़्लूब है उक़्बा में ग़ालिब है वही
मरकब-ए-मक़्तूल है इक रोज़ जो क़ातिल हुआ
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब
मिरा मशरब है रिंदी रिंद को मज़हब से क्या मतलब
साहिर देहल्वी
ग़ज़ल
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
फ़साद-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र हासिल-ए-तमाशा देख
सवार-ए-मरकब-ए-दुनिया ग़ुबार-ए-दुनिया देख
सय्यद अमीन अशरफ़
ग़ज़ल
मुद्दतों बा'द उस ने आज मुझ से कोई गिला किया
मंसब-ए-दिलबरी पे क्या मुझ को बहाल कर दिया