जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब

साहिर देहल्वी

जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब

साहिर देहल्वी

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    जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब

    मिरा मशरब है रिंदी रिंद को मज़हब से क्या मतलब

    किताब-ए-दर्स-ए-मजनूँ मुसहफ़-रुख़्सार-ए-लैला है

    हरीफ़-ए-नुक्ता-दान-ए-इश्क़ को मकतब से क्या मतलब

    हसीनान-ए-दो-आलम में है जल्वा हुस्न-ए-यकता का

    नज़र में हुस्न-ए-यकता जब हुआ उन सब से क्या मतलब

    हमारा होश हर-दम आश्ना-ए-नहनो-अक़रब है

    हुज़ूरी जिस को हासिल हो उसे यारब से क्या मतलब

    तमन्नाएँ बर आईं अपनी तर्क-ए-मुद्दआ हो कर

    हुआ दिल बे-तमन्ना अब रहा मतलब से क्या मतलब

    हमारे अर्सा-ए-शतरंज में है शाह दीवाना

    जिसे हासिल हो आज़ादी उसे अरदब से क्या मतलब

    हमारा सज्दा है हर गाम पर पीर-ए-तरीक़त को

    सुलूक-ए-इश्क़ में सर है क़दम मरकब से क्या मतलब

    हमें तो यार से मतलब है 'साहिर' और यारी से

    हमारा यार और अग़्यार के मतलब से क्या मतलब

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