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ग़ज़ल
मसाफ़-ए-रज़्म से हरगिज़ न जा आईना-ख़ानों में
ख़ुदा का शेर-दिल आफ़ात के क़ालिब में ढलता है
बेबाक भोजपुरी
ग़ज़ल
मिरा क्या है मुझे काँटों पे सो लेने की 'आदत है
मसाफ़-ए-ज़िंदगी में बालिश-ओ-बिस्तर न रक्खूँगा
जुनैद हज़ीं लारी
ग़ज़ल
'अदू की फ़ौज सफ़-बस्ता मुसल्लह भी मुनज़्ज़म भी
मगर हम हैं अभी ग़र्क़-ए-ख़याल-ए-रज़्म-आराई
अब्दुल्लाह ख़ालिद
ग़ज़ल
हमीं हैं अब हक़ाएक़ से जो कतरा कर निकलते हैं
हमीं थे जो मसाफ़-ए-ज़िंदगी में सफ़-ब-सफ़ निकले
अंजुम रूमानी
ग़ज़ल
वो मसाफ़-ए-जीस्त में हर मोड़ पर तन्हा रहा
फिर भी होंटों पर न उस के कोई भी शिकवा रहा
अलक़मा शिबली
ग़ज़ल
वक़्त-ए-सहर नज़र जो पड़ी सू-ए-रज़्म-गाह
दा'वा वफ़ा का था जिन्हें खे़मे उठा चले
मोहम्मद मुज़म्मिल ख़ान
ग़ज़ल
याद-ए-अय्यामे कि ये भी जान-ए-रज़्म-ओ-बज़्म थे
जिन के पास अब चश्म-ए-पुर-नम के सिवा कुछ भी नहीं