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ग़ज़ल
वो दाना-ए-सुबुल ख़त्मुर-रुसुल मौला-ए-कुल जिस ने
ग़ुबार-ए-राह को बख़्शा फ़रोग़-ए-वादी-ए-सीना
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
पर किए हैं जो अता ताक़त-ए-परवाज़ भी दे
या तो मैं खुल के उड़ूँ या मुझे बे-पर कर दे
ज़फर इबन-ए-मतीन
ग़ज़ल
फिर किसी ज़ख़्म के खुल जाएँ न टाँके देखो
रहने दो तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा रहने दो
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
तू ऐ मौला-ए-यसरिब आप मेरी चारासाज़ी कर
मिरी दानिश है अफ़रंगी मिरा ईमाँ है ज़ुन्नारी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
नाइब-ए-ख़ालिक-ए-कुल हूँ मैं ज़मीं पर 'तसनीम'
गर्दिश-ए-वक़्त मुसलसल है मिरे ही दम से
तसनीम अब्बास क़ुरैशी
ग़ज़ल
आरिज़ तेरे शम्अ' सफ़ा हैं राहबर-ए-कुल-अहल-ए-वफ़ा हैं
पहूँचा अपने मक़्सद तक इस रौशनी में परवाना भी
तबीब आरवी
ग़ज़ल
ढूँडते हैं तुझ को ही ऐ मतला'-ए-अनवार-ए-कुल
अंदरून-ए-का'बा-ओ-दर मश'अल-ए-बुत-ख़ाना हम
मोहम्मद फ़ैज़ान
ग़ज़ल
चाहता तो हूँ करूँ ख़ल्क़-ए-जहाँ पर ग़ौर-ओ-ख़ौज़
दर-गुज़र ऐ रब्ब-ए-कुल मसहूर हो जाता हूँ मैं
अख़लाक़ बन्दवी
ग़ज़ल
जुज़्व-ओ-कल का हम इस अंदाज़ से रिश्ता समझे
देख कर क़तरे को माहिय्यत-ए-दरिया समझे