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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
दिलों को तोड़ने वालो तुम्हें किसी से क्या
मिलो तो आँख चुरा लो तुम्हें किसी से क्या
सैफ़ुद्दीन सैफ़
ग़ज़ल
बे-झिजक आ के मिलो हँस के मिलाओ आँखें
आओ हम तुम को सिखाते हैं मिलाना दिल का