आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "mobile"
ग़ज़ल के संबंधित परिणाम "mobile"
ग़ज़ल
दौर-ए-जदीद है सारे राँझे अपने अपने मोबाइल पर
अपनी अपनी हीर को तकते तकते थक कर सो जाते हैं
शब्बीर एहराम
ग़ज़ल
हमारे पास भी है इक नए फ़ीचर का मोबाइल
'अजय' देखो तो मुट्ठी में ज़माना हम भी रखते हैं
अजय अज्ञात
ग़ज़ल
डाकिया ही थे कबूतर पहले मोबाइल न था
बातें सारी ख़त से की थीं मुँह-ज़बानी कुछ नहीं