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ग़ज़ल
ज़रदारों की वक़अत क्या है कौन ये गौहर बाँटेगा
हुब्ब-ए-उख़ुव्वत मेहर-ओ-मोहब्बत दिल का तवंगर बाँटेगा
सादुल्लाह खां असर मल्कापुरी
ग़ज़ल
कम से कम शतरंज के मोहरों सा खेला जाए
ये क्या है हम ताश के पत्ते होते जाते हैं
सुश्रुत पंत ज़र्रा
ग़ज़ल
रुख़-ए-रौशन से नक़ाब अपने उलट देखो तुम
मेहर-ओ-मह नज़रों से यारों की उतर जाएँगे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
बहज़ाद लखनवी
ग़ज़ल
कल रात तन्हा चाँद को देखा था मैं ने ख़्वाब में
'मोहसिन' मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
रखते हो तुम क़दम मिरी आँखों से क्यूँ दरेग़
रुत्बे में महर-ओ-माह से कम-तर नहीं हूँ मैं