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ग़ज़ल
आशियाँ कुंज-ए-क़फ़स से भी गिराँ-तर हो 'सहर'
गर मुआविन पर-ए-पर्वाज़ न होने पाए
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
ग़ज़ल
अभी तो माफियाओं के मज़ालिम ही बरसते थे
हुकूमत क्यूँ मुआविन बन गई वहशत में दहशत में
इरफान आबिदी मानटवी
ग़ज़ल
निगाह-ए-अद्ल से देखें तो मीर-ए-महफ़िल के
जलाल-ओ-माल मुआविन हैं ऐब-पोशी में