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ग़ज़ल
समझो कि जवानी ख़्वाब में है रुख़ बाँहों की मेहराब में है
जब तारे धीमे पड़ जाएँ जब शमएँ मद्धम हो जाएँ
शाद आरफ़ी
ग़ज़ल
तेरी शख़्सिय्यत है ला-फ़ानी उसे रख बरक़रार
ज़ात में महबूब और मुर्शिद की भी मुदग़म न हो
मोहन सिंह दीवाना
ग़ज़ल
समाए जा रहे हैं तेरे जल्वे मेरी आँखों में
तिरी हस्ती मिरी हस्ती में मुदग़म होती जाती है