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ग़ज़ल
न जाने मुतरिबा ने साज़ पर धुन कैसी छेड़ी है
शरीक-ए-बज़्म जितने हैं वो सारे रक़्स करते हैं
अल्तमश शम्स
ग़ज़ल
दिल दम-ए-आह-ए-सहर-ख़ेज़ चला जाता है
मुतरिबा चुप है तू क्यूँ वक़्त है प्रभाती का
हसरत अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
हम बिखर जाएँगे नग़्मों-भरे ख़्वाबों की तरह
मुतरिबा! छेड़ कभी हम को रबाबों की तरह
प्रेम वारबर्टनी
ग़ज़ल
मुतरिबा ने इस तरह छेड़े कुछ अरमानों के तार
कस गया अंगड़ाई लेते ही रुबाबों का बदन
प्रेम वारबर्टनी
ग़ज़ल
इस मुतरिब-ए-हयात में ज़िंदा है रागनी
रुक मुतरिबा अभी तू ये साज़-ए-सदा न तोड़
सालिम शुजा अन्सारी
ग़ज़ल
ऐ मुतरिबा-ए-फ़ितरत ये तू ही बता हम को
वहशत हमें होती है क्यों ज़मज़मा-ख़्वानी से